जागरण का बीज — “मैं कौन हूँ?”
हर मनुष्य के जीवन में एक क्षण ऐसा आता है जब भीतर से एक प्रश्न उठता है — “मैं कौन हूँ?” यह प्रश्न मात्र जिज्ञासा नहीं, बल्कि आत्मा की पुकार है। यह प्रश्न हमें बाहरी अंधेरों से भीतर की रोशनी की ओर ले जाता है। यह बौद्धिक नहीं, अनुभवात्मक खोज है — जिसे केवल महसूस किया जा सकता है, समझाया नहीं जा सकता। 1. पहचान की शुरुआत जागरण की यात्रा तब शुरू होती है जब हम अपने भीतर “द्रष्टा” को पहचानने लगते हैं — वह जो सब कुछ देख रहा है, पर स्वयं अप्रभावित रहता है। शरीर चल रहा है → “मैं शरीर नहीं, मैं देखने वाला हूँ।” विचार उठ रहा है → “मैं विचार नहीं, मैं देखने वाला हूँ।” भावना उठ रही है → “मैं भावना नहीं, मैं देखने वाला हूँ।” जैसे ही यह पहचान भीतर बैठने लगती है, एक नया दृष्टिकोण जन्म लेता है। तब हम सिर्फ जी नहीं रहे होते, बल्कि खुद को जीते हुए देख रहे होते हैं। 2. द्रष्टा का अनुभव जब कोई भीतर के द्रष्टा को छूता है, तो कुछ सूक्ष्म परिवर्तन घटित होते हैं — एक हल्कापन महसूस होता है, जैसे कोई बोझ उतर गया हो। विचारों और भावनाओं से एक स्वाभाविक दूरी बनने लगती है। भीतर एक कोमल शांति का स्पर्श होता है — ब...