"क्या आप खुद को नए रूप में देखना चाहेंगे?"

 


कभी-कभी जीवन हमें ऐसी गलियों में ले आता है जहाँ हम स्वयं को भूल जाते हैं। हम अपने वस्त्रों, अपनी स्थिति, अपनी असफलताओं से अपनी पहचान गढ़ लेते हैं।
लेकिन क्या यही सत्य है? या केवल एक माया?

कल मैंने एक चित्र बनाया—एक भिखारी, जिसके हाथ में कटोरा है, पर आँखों के सामने एक दर्पण। उस दर्पण में वह स्वयं को नहीं, एक राजा को देखता है।
और तभी मुझे लगा, यह चित्र नहीं, एक संदेश है। एक ब्लॉग नहीं, एक आह्वान है।

हर व्यक्ति ईश्वर की रचना है। हर एक में एक महत्व है।
कोई भी व्यर्थ नहीं बना। व्यर्थ होती है केवल वह सोच जो स्वयं को कमजोर मानती है।
आजकल लोग अवसाद में जा रहे हैं क्योंकि उन्होंने अपने अस्तित्व को दुनिया के पैमाने पर तौलना शुरू कर दिया है।
लेकिन सत्य तो यह है कि तुम्हारा अस्तित्व किसी को प्रभावित करने के लिए नहीं, स्वयं को पहचानने के लिए है।

जैसे तुम सोचते हो, वैसे ही बन जाते हो।
तुम्हारी सोच एक आह्वान है। यदि तुम स्वयं को हार गया समझते हो, तो तुम वही बन जाते हो।
यदि तुम स्वयं में एक राजा देखते हो, तो तुम्हारे चरित्र में राजसी शक्ति उत्पन्न होने लगती है।

राजा जनक और अष्टावक्र का प्रसंग

राजा जनक, जो मिथिला के शासक थे, एक बार अष्टावक्र ऋषि से ज्ञान प्राप्त करने पहुँचे। अष्टावक्र ने उन्हें आत्मा का स्वरूप समझाया—कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, न दुखी होती है, न बंधन में रहती है।
यह सुनकर जनक की दृष्टि बदल गई। उन्होंने अनुभव किया कि उनका असली स्वरूप शरीर या पद नहीं है, बल्कि शुद्ध आत्मा है।
उस अनुभूति में उन्होंने कहा:
"मुझे ही नमस्कार है।"
यह अहंकार नहीं था। यह आत्म-ज्ञान की घोषणा थी। जनक ने समझा कि जब मैं आत्मा हूँ, तो मैं ही सब हूँ। और जब मैं सब हूँ, तो किसी बाहरी मान्यता की आवश्यकता नहीं।

यही उदाहरण हमें सिखाता है कि जब हम अपनी सोच बदलते हैं, तो हमारी पूरी स्थिति बदल जाती है।
भिखारी भी दर्पण में राजा देख सकता है, और राजा भी आत्मा में परमात्मा देख सकता है।

संदेश

तो आज, यदि तुम स्वयं को कमजोर महसूस कर रहे हो, तो एक बार दर्पण में देखो।
लेकिन दर्पण का अर्थ केवल शीशा नहीं है—तुम्हारी सोच है, तुम्हारा दृष्टिकोण है।
तुम क्या हो, यह दुनिया नहीं बताएगी।
तुम क्या हो, यह तुम्हारी सोच बताएगी।


क्या आप तैयार हैं अपनी सोच को बदलकर अपने भीतर की शक्ति को पहचानने के लिए?

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