गणेश विसर्जन: मूर्ति का नहीं, हमारे मोह और अहंकार का विसर्जन
गणेश विसर्जन: मूर्ति का नहीं, हमारे मोह और अहंकार का विसर्जन “गणपति बप्पा मोरया… अगले बरस तू जल्दी आ!” गणेश उत्सव के दिनों में यह आवाज़ वातावरण को भक्तिमय बना देती है। घरों और पंडालों में गणपति आते हैं, उनकी पूजा होती है, आरती होती है, प्रसाद बाँटा जाता है और चारों ओर उत्सव का माहौल बन जाता है। लेकिन फिर एक दिन वही गणेश जी, जिन्हें हमने इतने प्रेम से अपने घर बुलाया था, उन्हें विदा करने का समय आ जाता है। विसर्जन। मन में एक अजीब-सा भाव होता है—उत्सव भी है और विदाई का दुःख भी। लेकिन क्या गणेश विसर्जन केवल एक धार्मिक परंपरा है? या इसके पीछे हमारे जीवन के लिए कोई गहरा आध्यात्मिक संदेश भी छिपा है? गणेश जी का आना क्या कहता है? हम गणेश जी की मूर्ति घर लाते हैं। मिट्टी से बनी उस प्रतिमा को हम भगवान का स्वरूप मानकर पूजते हैं। उनके सामने दीप जलाते हैं, फूल चढ़ाते हैं, मोदक अर्पित करते हैं और अपनी इच्छाएँ तथा परेशानियाँ उनके सामने रख देते हैं। लेकिन एक क्षण के लिए सोचिए— जिस मूर्ति को हम अपने हाथों से घर लाते हैं, वह हमें क्या सिखाने आई है? शायद यही कि ईश्वर को अपने जीवन में स्थान देना केवल प...