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जीवन का असली प्रश्न: प्रयास या स्वीकार?

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  भूमिका मैंने अक्सर देखा है कि आज का जीवन एक दौड़ बन गया है। किसी को शादी करनी है, किसी को अच्छी नौकरी चाहिए, किसी को बच्चों को पढ़ाना है, किसी को घर बनाना है। पहले की मूलभूत ज़रूरतें थीं – रोटी, कपड़ा और मकान । लेकिन आज के आधुनिक संस्कृति में “Naam” और “Fame” सबसे बड़ी चाहत बन गई है। हर कोई अपनी presence और importance साबित करना चाहता है। आधुनिक जीवन की दौड़ इस दौड़ में न तो किसी को समझाने का समय है और न ही किसी को समझने की ज़रूरत महसूस होती है। हर व्यक्ति अपने-अपने प्रयासों में इतना उलझा है कि जीवन के मूल प्रश्नों से दूर हो गया है। क्या सब कुछ पूर्वनियोजित है? अगर गहराई से देखें तो यह ब्रह्मांड एक automation की तरह चलता है। कोई अपनी मरज़ी से पैदा नहीं होता। कोई अपनी मरज़ी से मर नहीं सकता। तो फिर बीच का जीवन भी क्या सच में हमारे हाथ में है? हम सोचते हैं कि हम प्रयास कर रहे हैं, लेकिन हर thought, हर action अपने आप generate होता है। इसीलिए “कर्म मेरा है” कहना भी एक भ्रम हो सकता है। वर्तमान का महत्व भूतकाल में कोई जी नहीं सकता और भविष्य में जीना असंभव है। तो समझदारी यही है कि वर्तमा...