क्या अहंकार आत्मा को बाँध सकता है?
अहंकार परमात्मा को बाँधना चाहता है — दुर्योधन और श्रीकृष्ण से मिलने वाली सीख
महाभारत केवल पांडवों और कौरवों के युद्ध की कथा नहीं है। यदि हम इसे अपने भीतर घटने वाली एक आध्यात्मिक यात्रा की तरह देखें, तो इसके प्रत्येक पात्र में हमारे जीवन का कोई न कोई पक्ष दिखाई देता है।
दुर्योधन को केवल एक व्यक्ति के रूप में देखने के बजाय यदि हम उसे अहंकार का प्रतीक मानें और श्रीकृष्ण को परम सत्य, चेतना और विवेक का प्रतीक समझें, तो शांति-दूत के रूप में श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर जाना एक बहुत गहरा आध्यात्मिक संदेश देता है।
जब परमात्मा शांति का संदेश लेकर आता है
महाभारत में युद्ध को रोकने के लिए श्रीकृष्ण शांति-दूत बनकर हस्तिनापुर जाते हैं।
वे युद्ध नहीं चाहते। वे समझौते और धर्म के मार्ग से समस्या का समाधान चाहते हैं।
लेकिन दुर्योधन का अहंकार सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।
उसकी दृष्टि में सत्ता, अधिकार और अपना अहं ही सर्वोपरि था।
यही अहंकार की प्रकृति है।
जब हमारे भीतर अहंकार प्रबल होता है, तो सत्य हमारे सामने उपस्थित होने के बाद भी हम उसे स्वीकार नहीं कर पाते।
अहंकार की सबसे बड़ी भूल
दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का प्रयास किया।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह घटना अत्यंत प्रतीकात्मक है।
अहंकार सोचता है कि वह सब कुछ अपने नियंत्रण में कर सकता है।
वह शरीर को अपना मानता है।
वह संपत्ति को अपना मानता है।
वह संबंधों को अपना मानता है।
वह सफलता को अपना मानता है।
और अंततः वह यह भी मान बैठता है—
“मैं परम सत्य को भी अपनी इच्छा के अनुसार बाँध सकता हूँ।”
लेकिन परम सत्य को बाँधा नहीं जा सकता।
श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप इसी सत्य की ओर संकेत करता है कि जिसे पूरा अस्तित्व धारण करता है, उसे कोई सीमित अहंकार अपने अधिकार में नहीं कर सकता।
क्या अहंकार आत्मा को बाँध सकता है?
यहीं से प्रश्न हमारे अपने जीवन की ओर मुड़ता है।
क्या हमारा अहंकार वास्तव में आत्मा को बाँध सकता है?
आध्यात्मिक दृष्टि से उत्तर है—नहीं।
आत्मा को नित्य और साक्षी माना गया है। अहंकार आत्मा को वास्तव में कैद नहीं कर सकता।
लेकिन अहंकार एक भ्रम पैदा कर सकता है।
वह आत्मा की पहचान को शरीर और मन से जोड़ देता है—
“मैं शरीर हूँ।”
“मैं कर्ता हूँ।”
“यह मेरा है।”
“मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?”
यहीं से चित्त उन विचारों, इच्छाओं, स्मृतियों और संस्कारों को पकड़ने लगता है।
फिर मन उसी के चारों ओर घूमता रहता है।
इस प्रकार आत्मा बंधती नहीं, बल्कि जीव को बंधन का अनुभव होने लगता है।
चित्त कैसे बंधता है?
इसे एक सरल क्रम में समझ सकते हैं—
घटना → अहंकार → “मेरे साथ” की पहचान → चित्त में संस्कार → आसक्ति या द्वेष → मन का बंधन।
उदाहरण के लिए किसी ने हमारा अपमान किया।
घटना केवल कुछ शब्दों की थी।
लेकिन अहंकार कहता है—
“उसने मेरा अपमान किया।”
अब चित्त उस घटना को पकड़ लेता है।
बार-बार वही घटना याद आती है।
मन क्रोध करता है।
बुद्धि उस क्रोध के पक्ष में तर्क खोजने लगती है।
और व्यक्ति उसी घटना का कैदी बन जाता है।
यही सूक्ष्म बंधन है।
24 तत्त्व और हमारा शरीर
भारतीय दर्शन में शरीर और प्रकृति को समझाने के लिए 24 तत्त्वों की चर्चा मिलती है।
इनमें पाँच महाभूत, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ, पाँच तन्मात्राएँ तथा मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त जैसे सूक्ष्म तत्त्वों को समझाया जाता है।
इन सबको देखने पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—
यदि ये सब मेरे अनुभव के साधन हैं, तो फिर “मैं” कौन हूँ?
शरीर बदलता है।
इंद्रियों की क्षमता बदलती है।
विचार बदलते हैं।
भावनाएँ बदलती हैं।
स्मृतियाँ बदलती हैं।
अहंकार का भाव भी परिस्थितियों के साथ बदलता है।
फिर वह क्या है जो इन परिवर्तनों को देख रहा है?
यहीं से साधना का मार्ग प्रारंभ होता है—साक्षी को पहचानने का मार्ग।
दुर्योधन हमारे भीतर भी है
दुर्योधन केवल महाभारत का एक पात्र नहीं रह जाता, जब हम उसके भीतर छिपे अहंकार को अपने भीतर देखना शुरू करते हैं।
जब हम सत्य जानते हुए भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहते—
वहाँ दुर्योधन है।
जब हम कहते हैं—
“मैं ही सही हूँ।”
वहाँ दुर्योधन है।
जब हम अपनी इच्छा को धर्म से ऊपर रख देते हैं—
वहाँ दुर्योधन है।
और जब हमारे भीतर का अहंकार सत्य को भी अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास करता है—
तब हम उसी भूल को दोहराते हैं।
श्रीकृष्ण का संदेश
श्रीकृष्ण को केवल बाहर खोजने के बजाय यदि हम उनके संदेश को अपने भीतर सुनने का प्रयास करें, तो वे हमें अहंकार से ऊपर उठने का मार्ग दिखाते हैं।
कृष्ण का अर्थ केवल किसी बाहरी शक्ति को मान लेना नहीं है।
यह भी समझना है कि—
जो सत्य है, वह हमारे अहंकार की इच्छा से सत्य नहीं बनता।
सत्य हमारे नियंत्रण में नहीं है।
हमें अपने अहंकार को सत्य के सामने झुकाना होता है।
असली युद्ध कहाँ है?
महाभारत का सबसे बड़ा युद्ध शायद केवल कुरुक्षेत्र में नहीं था।
एक कुरुक्षेत्र हमारे भीतर भी है।
एक ओर अहंकार है—
“मैं।”
दूसरी ओर विवेक और सत्य है—
“मैं वास्तव में कौन हूँ?”
एक ओर आसक्ति है।
दूसरी ओर साक्षीभाव है।
एक ओर नियंत्रण की इच्छा है।
दूसरी ओर समर्पण है।
और इसी आंतरिक संघर्ष में मनुष्य का आध्यात्मिक जीवन आगे बढ़ता है।
अंतिम बात
दुर्योधन श्रीकृष्ण को बाँधना चाहता था।
लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो वह श्रीकृष्ण को नहीं, अपनी ही चेतना को अहंकार के बंधन में बाँध रहा था।
परमात्मा को कैद करने की कोशिश कभी सफल नहीं होती।
अहंकार जितना परम सत्य को अपने अनुसार बदलना चाहता है, उतना ही स्वयं अपने बनाए हुए बंधन में फँसता जाता है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं कि—
“क्या अहंकार आत्मा को बाँध सकता है?”
बल्कि प्रश्न यह है—
“क्या मैं अपने अहंकार को पहचानकर यह जान सकता हूँ कि मैं वास्तव में वह नहीं हूँ जिसे अहंकार ‘मैं’ कहता है?”
शायद यहीं से भीतर की यात्रा शुरू होती है।
श्रीकृष्ण को बाँधने की कोशिश करने वाला दुर्योधन हमें यह याद दिलाता है—परमात्मा को बाँधना संभव नहीं, लेकिन अपने अहंकार में स्वयं को बाँध लेना बहुत आसान है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें