जीवन है या भूलभुलैया?
शास्त्रों से मौन तक की यात्रा
भूमिका
शायद अपनी जीवन यात्रा में हम सबने कभी न कभी किसी शास्त्र का पाठ किया है—चाहे पाठशाला में, घर के पूजा-पाठ में, या गुरुकुल में। शास्त्रों ने हमें धर्म, कर्म, भक्ति और ज्ञान के विविध मार्ग दिखाए हैं। परंतु अंततः हर साधक का प्रश्न यही रहता है: सत्य क्या है?
शास्त्रों का उद्देश्य
शास्त्र मार्गदर्शन देते हैं, दिशा दिखाते हैं।
वे जीवन के नैतिक और आध्यात्मिक नियमों को समझाते हैं।
हर ग्रंथ अपने दृष्टिकोण से मुक्ति का मार्ग बताता है।
भिन्नताएँ और भ्रम
भगवद गीता कर्म और धर्म पर बल देती है।
अष्टावक्र गीता अद्वैत और आत्मज्ञान की ओर ले जाती है।
जपुजी साहिब ईश्वर की एकता और नाम सिमरन पर केंद्रित है।
धम्मपद सजगता और करुणा का मार्ग दिखाता है।
इन भिन्नताओं से साधक कभी-कभी भ्रमित हो जाता है। परंतु यह भ्रम भी साधना का हिस्सा है—क्योंकि यह साधक को भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करता है।
मौन का मार्ग
अंततः सभी शास्त्र मौन की ओर संकेत करते हैं।
मौन का अर्थ है भीतर की चंचलता को शांत करना।
मौन में ही सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव होता है।
मौन की कठिनाई
मौन सरल दिखता है, पर टिकना कठिन है।
साधक कुछ ही मिनटों तक मौन में रह पाता है, फिर विचारों की धारा उसे खींच लेती है।
यही साधना है: हर बार विचारों से लौटकर मौन में प्रवेश करना।
निष्कर्ष
शास्त्र शब्दों में मार्ग दिखाते हैं, पर मंज़िल मौन में है। ईश्वर ने मार्ग को सरल बनाया है—मौन—पर भूलभुलैया भी रची है, ताकि हर साधक अपनी यात्रा स्वयं पूरी करे।
मौन ही वह स्थान है जहाँ सभी भिन्नताएँ मिट जाती हैं और केवल सत्य शेष रहता है।

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