महाभारत की अनसुनी कथा



क्या आप जानते हैं ? जब 18 दिनों तक चलने वाला महाभारत-युद्ध जब समाप्त हुआ तो नियम के अनुसार पहिले सारथी उतरता है, और फिर सवार। लेकिन उस दिन श्री कृष्ण ने अर्जुन को पहले उतरने को कहा। जैसे ही कृष्ण स्वयं उतरे और हनुमान (ध्वजा पर विराजमान) अंतर्धान हुए, रथ धधककर जल उठा। 

अर्जुन ने तब घबराकर श्री कृष्ण की और देखा तो श्री कृष्ण ने कहा, "हे अर्जुन! यह रथ तो भीष्म, द्रोण और विशेषकर कर्ण के दिव्यास्त्रों से बहुत पहले नष्ट हो चुका था। मेरी शक्ति और हनुमान की उपस्थिति से ही यह मेरे संकल्प पर चल रहा था।" इससे अर्जुन का अहंकार मिटा, जो कर्ण पर विजय पाने से हो गया था।


आध्यात्मिक अर्थ

1. ईश्वर की कृपा ही रक्षा है

     रथ का नष्ट होना यह दर्शाता है कि मनुष्य का शरीर और साधन केवल ईश्वर की शक्ति से ही सुरक्षित रहते हैं।
     जब तक कृष्ण सारथी हैं और हनुमान ध्वज पर हैं, तब तक कोई भी दिव्यास्त्र हानि नहीं कर सकता।

2. अहंकार का त्याग

     अर्जुन को पहले उतरने को कहना यह संकेत है कि साधक को पहले अपने अहंकार और "मैं" भाव से उतरना चाहिए।
     ईश्वर अंत में उतरते हैं, यह दिखाता है कि जब साधक तैयार होता है, तभी ईश्वर अपनी लीला पूरी करते हैं।

3. संसार की नश्वरता

     रथ का जलना यह बताता है कि युद्ध, शरीर, साधन—all are temporary.
     केवल आत्मा और ईश्वर की कृपा शाश्वत है।

4. साक्षी भाव

     हनुमान जी का अंतर्ध्यान होना यह दर्शाता है कि दिव्य शक्ति केवल तब तक प्रकट होती है जब तक साधक को उसकी आवश्यकता है।
उसके बाद साधक को स्वयं साक्षी भाव में रहकर जीवन का अनुभव करना होता है।


सार

यह कथा हमें यह सिखाती है कि मनुष्य का जीवन रथ की तरह है—जो बाहरी प्रहारों से सुरक्षित केवल तब तक है जब तक ईश्वर सारथी हैं और भक्ति ध्वज पर है। जब ईश्वर की कृपा हटती है, तब संसार की नश्वरता प्रकट होती है।

    • "अपने जीवन के अनुभवों पर विचार करें—कब आपको लगा कि केवल ईश्वर की उपस्थिति ने आपको बचाया? अपनी अनुभूति साझा करें और दूसरों को भी प्रेरित करें।


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