निरंतर जागरण का अभ्यास


 

द्रष्टा में स्थिर रहना एक अवस्था है, लेकिन निरंतर जागरण एक अभ्यास है। स्थिरता कभी-कभी टूट सकती है, लेकिन जागरण का अभ्यास उसे फिर से वापस लाता है। निरंतर जागरण का मतलब है—दिनभर के हर अनुभव में अपने अस्तित्व को याद रखना। यह भाग आपको सिखाएगा कि कैसे जीवन की हर क्रिया में जागृत रहें।


1. जागरण कोई विशेष समय की गतिविधि नहीं है

जागरण ध्यान का समय नहीं, न ही किसी शांत जगह या विशेष मुद्रा की जरूरत है। इसका अर्थ है—जो भी हो रहा है, उसे होते हुए देखना। यह हर जगह संभव है:

        चलते समय

        खाते समय

        बात करते समय

        काम करते समय

        गुस्सा आते समय

        डर उठते समय

जागरण का अभ्यास जीवन के बीच में होता है, जीवन से अलग नहीं। इसे अपनाएं, तो आपका हर पल जागृत हो जाएगा।

2. विचार उठते ही पहचान लेना—यही निरंतरता की शुरुआत

निरंतर जागरण का पहला संकेत: विचार आते ही उसे पकड़ लेना। मतलब:

        विचार आया

        आपने तुरंत नोटिस किया

        और वह आगे नहीं बढ़ पाया


यह "रोकना" नहीं, बल्कि सिर्फ "देख लेना" है। इस छोटी सी जागरूकता से विचारों की धारा कमजोर पड़ने लगती है।


3. भावनाओं को तुरंत पहचानना—जागरण को मजबूत बनाता है

भावनाएँ तेज़ होती हैं, लेकिन जागरण उनसे भी तेज़ हो सकता है। उदाहरण देखिए:

        गुस्सा उठा → "गुस्सा है, मैं नहीं"

        डर उठा → "डर है, मैं नहीं"

        बेचैनी उठी → "यह बेचैनी है, मैं नहीं"


जैसे ही पहचान हुई, भावना की पकड़ ढीली पड़ जाती है। यही निरंतर जागरण की ताकत है।


4. प्रतिक्रिया देने से पहले एक क्षण का अंतराल

निरंतर जागरण का सबसे स्पष्ट संकेत: प्रतिक्रिया और घटना के बीच एक छोटा सा अंतराल।


        पहले: घटना → तुरंत प्रतिक्रिया

        अब: घटना → देखना → फिर प्रतिक्रिया

यह छोटा अंतराल ही जागरण की शक्ति है, जो आपको स्वतंत्र बनाता है।


5. पुरानी प्रोग्रामिंग बार-बार सक्रिय होगी—यही अभ्यास का मैदान

निरंतर जागरण का मतलब पुरानी आदतें खत्म करना नहीं। बल्कि:

        हर बार प्रोग्रामिंग उठे, उसे पहचान लें

        विचार शांत होने की प्रतीक्षा न करें

        भावनाएँ आएँगी ही, उन्हें देखें

        नहीं: पुरानी आदतें खत्म हो जाएँगी।

        हाँ: हर बार पहचानना ही विकास है। यही अभ्यास का असली मैदान है।


6. जागरण टूटेगा—और यही सामान्य है

निरंतर जागरण का मतलब हमेशा द्रष्टा में रहना नहीं। जागरण टूटेगा, बार-बार टूटेगा। लेकिन हर बार वापस लौटना ही इसे मजबूत बनाता है। यह सामान्य प्रक्रिया है—चिंता न करें।


निष्कर्ष: जागरण एक अभ्यास है, लक्ष्य नहीं

निरंतर जागरण का सार:

        विचार को आते ही देखना

        भावना को उठते ही पहचानना

        प्रतिक्रिया से पहले रुकना

        हर बार अपने अस्तित्व में लौट आना

यही मानव जागृति का चौथा चरण है। इसे आज से अपनाएं, और जीवन बदल जाएगा। अगले भाग में और गहराई में जाएंगे।


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पहले के सभी भागो को पड़ने के लिए :

स्थिरता से गहराई की ओर

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