द्रष्टा में स्थिरता
दोस्तों, मानव जागृति : ‘मैं कौन हूँ?’ की यात्रा इस श्रृंखला में हम अब तक देख चुके हैं कि जागरण का पहला स्पर्श तब होता है, जब भीतर यह प्रश्न जागता है – “मैं कौन हूँ?”
यहीं से बीज अंकुरित होता
है, और साधक पहली बार महसूस करता है कि वह केवल शरीर, विचार या भावनाएँ नहीं है, बल्कि उनका द्रष्टा है।
बीज के अंकुरित होने के बाद
आता है दूसरा चरण — स्थिरता।
स्थिरता का अर्थ है: बार‑बार द्रष्टा में लौटना और वहाँ ठहरने का अभ्यास करना।
1. स्थिरता का अभ्यास
- श्वास को देखते रहना: हर श्वास आपको वर्तमान क्षण में
वापस लाती है।
- विचारों को आते‑जाते देखना: विचार आते हैं, जाते हैं, लेकिन आप उन्हें
पकड़ते नहीं।
- भावनाओं को पहचानना: गुस्सा, डर, बेचैनी—सबको बस देखते
रहना, उनके साथ बह जाना नहीं।
2. स्थिरता का अनुभव
जब आप द्रष्टा में स्थिर
होते हैं, तो भीतर एक अलग तरह की शांति का अनुभव होने लगता है।
- हल्कापन: जैसे भीतर से कोई पुराना बोझ उतर गया हो।
- दूरी: विचार और भावनाएँ अब उतनी भारी नहीं लगते, उनसे थोड़ा फासला महसूस होता है।
- शांति: भीतर मौन का एक गहरा, कोमल स्पर्श महसूस होता है।
3. स्थिरता की चुनौती
लेकिन यह स्थिरता अक्सर
अस्थायी होती है, बार‑बार टूट जाती है।
- बार‑बार भूलना
- मन का यहाँ‑वहाँ खिंच जाना
- पुरानी आदतों की पकड़
यही चुनौतियाँ अभ्यास का ही
हिस्सा हैं; हर बार टूटकर फिर से लौटना ही साधना की असली ट्रेनिंग है।
निष्कर्ष
स्थिरता अभी भले ही अस्थायी
हो, पर यही आगे आने वाले गहरे जागरण की मूल भूमि है।

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