अनुभव से विचार तक: एक सरल यात्रा
साक्षी चेतना: जो देखती है, अनुभव करती है, लेकिन कभी नहीं बदलती
नमस्कार, आनंदविवेक परिवार!
पिछले ब्लॉग में हमने देखा कि जो बदलता है, वह दृश्य है। लेकिन जो देखता है और अनुभव करता है — वह साक्षी है, वही चेतना है। बचपन से अब तक सब कुछ देख रही यह चेतना खुद कभी नहीं बदली। आज हम इसी साक्षी चेतना की गहराई में उतरेंगे। क्या आप तैयार हैं?
अनुभव किसे होता है? परतें खोलते हैं
अनुभव का सवाल गहरा है। आइए देखें:
शरीर? नहीं, वह तो सिर्फ माध्यम है — बदलता रहता है।
मन? वह भावनाओं में उलझा रहता है, स्थिर नहीं।
बुद्धि? वह तो विश्लेषण करती है, लेकिन अनुभव की जड़ नहीं।
अनुभव का आधार चेतना है। अगर चेतना न हो, तो शरीर जीवित होते हुए भी मृत हो जाता है। यह साक्षी चेतना ही सब कुछ देखती और महसूस करती है।
अनुभव कैसे विचार बनते हैं? यह क्रम देखिए:
इंद्रियां अनुभव लाती हैं — दुनिया की घटनाएं।
मन उन्हें स्मृति में संजोता है — यादें बन जाती हैं।
बार-बार दोहराए गए अनुभव संस्कार बन जाते हैं — गहरी आदतें।
संस्कारों से विचार जन्म लेते हैं — जो जीवन की दिशा तय करते हैं।
अनुभव → स्मृति → संस्कार → विचार। यही वह यात्रा है जो हमारे जीवन को आकार देती है।
सरल भाषा में समझें: स्क्रीन और फिल्म का खेल, कल्पना कीजिए:
चेतना = वह स्क्रीन है जिस पर सब चलता है।
शरीर, मन, बुद्धि = एक्टर्स जो स्क्रीन पर परफॉर्म करते हैं।
अनुभव = वह फिल्म जो बार-बार चलती है।
संस्कार = फिल्म के रिपीट सीन।
विचार = फिल्म से निकले डायलॉग।
लेकिन स्क्रीन कभी नहीं बदलती — वही सत्य है। भगवद्गीता की तरह, यह साक्षी चेतना ही 'क्षेत्रज्ञ' है।
आज का अभ्यास: खुद से साक्षात्कार
आज यह सरल अभ्यास करें:
दर्पण में खुद को देखें और सोचें:
क्या तुम वही हो जो बचपन में थे?
क्या चेहरा बदल गया है?
लेकिन अंदर का "मैं" अब भी वही है?
आंखें बंद करें और पूछें:
अनुभव किसे हो रहा है?
शरीर, मन, या चेतना?
यह अभ्यास आपकी साक्षी चेतना को जागृत करेगा। नियमित करें, और बदलाव महसूस होगा!
क्या आपको यह सफर पसंद आया? कमेंट में अपना अनुभव शेयर करें। अगले ब्लॉग में हम संस्कारों को कैसे तोड़ें, यह जानेंगे। जय श्रीकृष्ण! 🙏
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