कभी सोचा कि सत्य है क्या?
आज हम शुरुआत करते हैं एक सवाल से:
आपको क्या लगता है, इस संसार में सत्य क्या है?
कहीं सुनी हुई बातों से नहीं, बल्कि अपने अनुभव से सोचकर बताइए।
मेरे हिसाब से सत्य वही होना चाहिए जिसे बदला नहीं जा सकता।
चारों ओर नज़र डालो
ज़रा सोचिए — हमारे चारों ओर जितने भी दृश्य हैं, उनमें क्या है जो नहीं बदलता?
• रास्ते बदलते हैं
• इन्फ्रास्ट्रक्चर बदलता है
• लोग और उनकी आदतें बदलती हैं
• तापमान और मौसम बदलते हैं
• पेड़-पौधे बदलते हैं
• और मैं भी तो बचपन से अब तक बदल ही रहा हूँ
तो क्या सब कुछ असत्य है?
अगर सब बदल रहा है, तो असली सत्य कहाँ है?
दर्पण का अनुभव
आज सुबह जब मैंने दर्पण में खुद को देखा, तो यह साफ़ हुआ कि चेहरा भी बदलता रहा है —
बचपन से जवानी और अब अधेर उम्र तक।
फिर अचानक ख्याल आया:
"क्या मैं भी झूठ हूँ? सत्य नहीं?"
लेकिन जब थोड़ी देर गहराई से सोचा, तो लगा —
अगर यह दर्पण ही न होता, तो भीतर से मुझे लगता कि मैं तो बचपन से बिल्कुल वैसा ही हूँ।
असली बोध
दृश्य बदलते गए, लेकिन देखने वाला वही रहा।
यही है सत्य —
जो कभी नहीं बदलता, जो हर परिवर्तन का साक्षी है।
दार्शनिक दृष्टि
• उपनिषद कहते हैं: "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" — ब्रह्म ही सत्य है, जो अपरिवर्तनीय है।
• महाभारत में भी कहा गया है: "सत्यं एव जयते" — सत्य की ही विजय होती है।
• बौद्ध दर्शन: सब कुछ अनित्य है, लेकिन उस अनित्य के पीछे जो शून्यता है, वही अंतिम सत्य है।
In nutshell
• "Mirror सिर्फ़ body का update दिखाता है, पर soul का version हमेशा same रहता है।"
• "चेहरा बदलता है, पर देखने वाला कभी नहीं बदलता — that’s the real truth."
पाठक के लिए अभ्यास
आज दर्पण में खुद को देखो और दो मिनट रुककर सोचो:
• बदलने वाला कौन है?
• और देखने वाला कौन है?
जब यह फर्क समझ में आ जाए, तो तुम सत्य को छू लोगे।
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