जो चाहो मिलेगा l



क्यों? यही चाहते हो ना आप सब...

लेकिन कभी सोचा है कि exactly हमें चाहिए क्या?


इच्छा को दबाया या रोका तो नहीं जा सकता।

अब प्रश्न यह है—इच्छा वास्तव में वस्तु की होती है या उस अनुभव की जो वस्तु पाने के बाद महसूस होगा?


मन मानता है कि जब कुछ पा लूँगा तब सुख होगा, या जब परिस्थिति सुधरेगी तब शांति मिलेगी।

जबकि देखोगे तो पाओगे कि इच्छा किसी वस्तु से नहीं जुड़ी होती, बल्कि उस अधूरेपन की भावना से जुड़ी होती है जो मनुष्य अपने भीतर अनुभव करता है।


परंतु जिस क्षण सुख का अनुभव होता है, वह इच्छा की पूर्ति से नहीं, बल्कि इच्छा और चिंता की अनुपस्थिति से होता है।


सुख का रहस्य

सुख पहले से ही मौजूद है। केवल इच्छा और चिंता हटने पर वह प्रकट होता है।


तब प्रश्न उठता है—यदि कुछ चाहने को नहीं रहा, कुछ पकड़ने को नहीं रहा, तो जीवन किस दिशा में बहेगा?


नदी दिशा से नहीं, ढलान से बहती है। जब अवरोध हट जाता है, तो प्रवाह स्वयं प्रकट होता है।

इच्छा और चिंता जीवन की शक्ति नहीं, बल्कि अवरोध थीं।

                जब वे हटती हैं, तो:

                कर्म रुकते नहीं,

                संबंध टूटते नहीं,

                संसार गायब नहीं होता।

बस प्रतिक्रिया कम हो जाती है, घबराहट ढीली पड़ जाती है, जल्दबाज़ी गल जाती है, और जीवन वैसा ही दिखता है जैसा वह वास्तव में है।


परिणाम और सत्य

जब हम परिणाम की चिंता नहीं करते, तो क्या काम बिगड़ जाता है?

जब डर के बिना बोलते हैं, तो शब्द अधिक सच्चे होते हैं।

जब पाने की जल्दी नहीं होती, तो क्षण अधिक स्पष्ट होता है।

जीवन को सुधारने की आवश्यकता नहीं है। जीवन कोई दौड़ नहीं है। बस जीना ही पर्याप्त है। यह अवस्था कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि हमारा स्वभाव है।


जब तक हम स्वयं को अलग मानते हैं, तब तक पाने की जलन बनी रहती है। लेकिन जिस क्षण यह स्पष्ट हो जाता है कि देखने वाला और जो देखा जा रहा है, वे अलग नहीं हैं—इच्छाएँ अपना आधार खो देती हैं।


क्या आपने कभी महसूस किया ऐसा? कमेंट में बताएं—आपकी इच्छा का असली राज क्या है?

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