“क्या सिर्फ मेहनत ही सफलता की कुंजी है?

 



हमारे जीवन में सबसे बड़ी बाधा अक्सर असफलता नहीं होती, बल्कि असफलता का डर होता है। यही डर हमें प्रतियोगिता में उतरने से रोकता है, नए अवसरों को अपनाने से रोकता है, और हमारी क्षमता को सीमित कर देता है।

डर क्यों रोकता है?

डर हमें भविष्य की नकारात्मक कल्पनाओं में बाँध देता है।

यह हमें पहला कदम उठाने से रोकता है।

डर के कारण हम उन अवसरों को खो देते हैं, जहाँ जीत की संभावना मौजूद होती है।

सफलता को चुनना

सफलता का मार्ग तभी खुलता है जब हम साहस के साथ पहला कदम रखते हैं।

इच्छा और प्रयास मिलकर डर को पराजित करते हैं।

सफलता चुनना मतलब है — अपने सपनों को प्राथमिकता देना और असफलता को सीख मानकर आगे बढ़ना।


विजय का रहस्य

जब हम डर को छोड़ देते हैं और सफलता को चुनते हैं, तो विजय स्वयं हमारे कदमों में आकर ठहर जाती है।


एकलव्य की कहानी तो तुम्हें याद ही होगी 


एकलव्य एक आदिवासी बालक था, जिसे धनुर्विद्या सीखने की तीव्र इच्छा थी। उसने गुरु द्रोणाचार्य को अपना आदर्श माना, लेकिन द्रोणाचार्य ने उसे शिष्य बनाने से मना कर दिया।

फिर भी, एकलव्य ने मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसे गुरु मान लिया और जंगल में स्वयं अभ्यास शुरू किया। उसकी साधना इतनी प्रबल थी कि वह महान धनुर्धरों से भी आगे निकल गया।


निष्कर्ष

जीवन का सबसे बड़ा सबक यही है:

“डर को छोड़ो, सफलता को चुनो, तभी जीत तुम्हारे कदम चूमेगी।”

यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन है जो हर व्यक्ति को अपनी यात्रा में अपनाना चाहिए।


ऐसे ही जागरण-कारी विचारों के लिए जुड़े रहिए — और अपने जीवन में बदलाव की शुरुआत कीजिए।"


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