सुना है समर्पण सभी दुखों का अंत है…
यह पंक्ति हमें भीतर झाँकने पर मजबूर कर देती है। क्या सच में समर्पण ही वह राह है, जो हमें शांति और मुक्ति तक ले जाती है?
सबसे पहले जानना ज़रूरी है—समर्पण की ज़रूरत ही क्यों पड़ेगी? क्यों कोई इंसान समर्पण करेगा?
अमीर ऐशो-आराम में डूबा रहता है।
गरीब रोज़ी-रोटी कमाने में व्यस्त।
सुखी व्यक्ति कहता है, "समर्पण के लिए समय कहाँ?"
लेकिन दुख और डर ही वह धागा हैं, जो इंसान को धक्के खाने के बाद समर्पण की ओर झुकाते हैं। जब जीवन की मार पड़ती है, तब अपनी सीमित शक्ति का एहसास होता है। तभी दूसरों से ज्ञान लेते हैं और धीरे-धीरे भगवान के चरणों में समर्पित हो जाते हैं।
🌱 समर्पण का रहस्य
समर्पण कोई कमज़ोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है।
दुख-डर हमारी परीक्षा हैं, जो याद दिलाते हैं—हम अकेले नहीं।
अहंकार टूटने पर ही समर्पण जन्म लेता है।
यह हमें छोटे "मैं" से निकालकर बड़े सत्य से जोड़ता है।
भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं—"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"। यानी सब कुछ छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ।
📖 एक छोटी प्रेरक कहानी
एक गरीब किसान था। एक साल भयंकर सूखे ने उसकी फसल नष्ट कर दी। धन गया, परिवार बीमार, घर उजड़ गया। हताश होकर वह मंदिर पहुँचा और ईश्वर से बोला, "अब सब कुछ तुम्हारे हवाले।"
उस रात उसे गहरी नींद आई। अगले दिन बारिश हुई, नई फसल लहलहाई। परिवार ठीक हुआ। लेकिन अब वह हर सुख-दुख को समर्पण की नज़र से देखता। समर्पण ने उसे नया जीवन दिया।
🌅 रोज़मर्रा में समर्पण कैसे अपनाएँ?
समर्पण को जीवन का हिस्सा बनाना आसान है:
ध्यान-प्रार्थना: रोज़ 10 मिनट मन शांत करें, किसी बड़े उद्देश्य को समर्पित करें।
कर्मयोग: हर काम को भगवान की सेवा मानें—चाहे बर्तन धोना हो या ऑफिस का प्रोजेक्ट।
छोड़ना सीखें: जो नियंत्रण से बाहर हो (जैसे ट्रैफिक या बॉस का मूड), उसे भगवान पर छोड़ दें।
💡 अंतिम विचार
समर्पण दुख से भागने नहीं देता, बल्कि उसे शक्ति में बदल देता है। यह छोटी चिंताओं से ऊपर उठाकर अनंत शांति से जोड़ता है। समर्पण का महत्व समझ आया?
आपको क्या लगता है? कमेंट में ज़रूर बताएँ—क्या आपने कभी समर्पण का अनुभव किया? शेयर करें, ताकि सब प्रेरित हों!

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें