कर्म बड़ा है या स्वार्थ?

 


प्रिय दोस्तों,

मैंने भगवद्गीता को बहुत बार पढ़ा है। खास बात यह है कि हर बार इसके मायने मुझे चौंका देते हैं। जितनी बार पढ़ता हूँ, उतना ही इसे जानने का जुनून बढ़ता जाता है।

शब्दों में शायद मैं इसे पूरी तरह समझा न पाऊँ, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण की जो छवि मेरे मन में बनती है, वह अतुलनीय है। अलग-अलग जगहों पर, कोट्स में, ज्ञान-चर्चाओं और प्रवचनों में हमने बहुत सुना है—“कर्म करो और फल की चिंता मत करो।”

यह भी सुनते हैं कि जो निस्वार्थ भाव से कर्म करता है, भगवान उसके कार्य पूरे कर देते हैं।

तो क्या इसका अर्थ यह है कि भगवान श्रीकृष्ण की राह पर चलें, अच्छे कर्म करें और फिर हमें सब कुछ प्राप्त हो जाएगा?

फिर सवाल उठता है—कर्म करना, फल पाना, फल की चिंता न करना और निस्वार्थ रहना—आखिर इस पूरे रहस्य को समझें कैसे?

इसी सवाल का एक बहुत गहरा उत्तर भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के 22वें श्लोक में मिलता है।

श्रीकृष्ण कहते हैं—मुझे कुछ प्राप्त करना बाकी नहीं

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—

“न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥”

अर्थात्—

“हे पार्थ! तीनों लोकों में मेरे लिए ऐसा कोई कर्तव्य नहीं है जिसे मुझे करना ही चाहिए। ऐसा भी कुछ नहीं है जो मुझे प्राप्त नहीं हुआ है और जिसे मुझे प्राप्त करना हो। फिर भी मैं कर्म में लगा रहता हूँ।”

यहीं से गीता का एक अद्भुत रहस्य खुलता है।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्हें कुछ प्राप्त करना बाकी नहीं है। फिर भी वे कर्म करते हैं।

लेकिन क्यों?

तीनों लोकों से क्या तात्पर्य है?

श्लोक में आया है—“त्रिषु लोकेषु”, अर्थात् तीनों लोकों में।

वैदिक परंपरा में सामान्य रूप से इन्हें भूः, भुवः और स्वः लोक के रूप में समझा जाता है—पृथ्वी लोक, उसके ऊपर का सूक्ष्म/अंतरिक्ष क्षेत्र और स्वर्गलोक।

लेकिन यहाँ केवल तीन स्थानों को समझना ही पर्याप्त नहीं है।

श्रीकृष्ण का भाव यह है कि समस्त अस्तित्व में उनके लिए ऐसा कुछ भी शेष नहीं है जिसे अपनी पूर्णता के लिए उन्हें प्राप्त करना हो।

अर्थात् उनके लिए कोई व्यक्तिगत उपलब्धि बाकी नहीं है।

“मेरे लिए कुछ करने को नहीं है” का अर्थ

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि श्रीकृष्ण कर्म को महत्वहीन मानते हैं।

इसका अर्थ है कि उन्हें कोई ऐसा व्यक्तिगत, स्वार्थपूर्ण कर्तव्य नहीं करना है जिससे उन्हें कोई कमी पूरी करनी हो।

हम सामान्यतः कर्म क्यों करते हैं?

नौकरी करते हैं क्योंकि धन चाहिए।
व्यापार करते हैं क्योंकि सफलता चाहिए।
पढ़ाई करते हैं क्योंकि ज्ञान, डिग्री या नौकरी चाहिए।
मेहनत करते हैं क्योंकि भविष्य बेहतर बनाना चाहते हैं।

अर्थात् हमारे बहुत से कर्मों के पीछे एक भावना होती है—

“मेरे पास यह नहीं है, मुझे इसे प्राप्त करना है।”

लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं—

“मेरे लिए ऐसा कुछ भी नहीं है जो मुझे प्राप्त करना बाकी हो।”

यानी उनका कर्म किसी कमी को पूरा करने के लिए नहीं है।

साइकिल चलाने वाले पिता का उदाहरण

इसे एक छोटे से उदाहरण से समझिए।

एक पिता अपने बच्चे को साइकिल चलाना सिखा रहा है। पिता को पहले से साइकिल चलानी आती है। उसे साइकिल चलाकर कुछ नया प्राप्त नहीं करना है।

फिर भी वह बच्चे के सामने साइकिल चलाता है।

क्यों?

क्योंकि बच्चा उसे देखकर सीखता है।

पिता का साइकिल चलाना उसकी अपनी आवश्यकता नहीं है। वह बच्चे के सीखने के लिए है।

ठीक इसी तरह श्रीकृष्ण स्वयं कर्म करते हैं।

उन्हें कुछ प्राप्त करना बाकी नहीं है, लेकिन संसार उनके आचरण से सीखता है।

इसलिए उनका कर्म केवल उनका व्यक्तिगत कर्म नहीं रह जाता, बल्कि एक आदर्श बन जाता है।

फिर निष्काम कर्म क्या है?

यहाँ एक बहुत बड़ा भ्रम दूर करना जरूरी है।

निष्काम कर्म का अर्थ यह नहीं है कि जीवन में कोई इच्छा ही न रखें या कर्म का कोई परिणाम न चाहें।

एक विद्यार्थी अच्छे अंक चाहता है।
एक किसान अच्छी फसल चाहता है।
एक व्यवसायी सफलता चाहता है।

यह स्वाभाविक है।

समस्या इच्छा में नहीं, बल्कि फल के प्रति आसक्ति में है।

मैं पूरी मेहनत करूँ, अपनी क्षमता का पूरा उपयोग करूँ, लेकिन परिणाम मेरी इच्छा के अनुसार न आए तो मेरा पूरा अस्तित्व ही टूट जाए—यह आसक्ति है।

गीता हमें कर्म से भागना नहीं सिखाती।

वह हमें यह सिखाती है कि कर्म पूरी निष्ठा से करो, लेकिन फल को अपने अहंकार और अपनी पहचान का आधार मत बनाओ।

तो क्या भगवान हर इच्छा पूरी कर देंगे?

शायद यही वह जगह है जहाँ हम गीता को अक्सर गलत समझ लेते हैं।

निस्वार्थ कर्म का अर्थ यह नहीं है कि भगवान हमारे हर मनचाहे परिणाम की गारंटी देते हैं।

अगर मैंने अच्छे कर्म किए हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि जीवन में मेरी हर इच्छा उसी रूप में पूरी होगी जैसी मैं चाहता हूँ।

क्योंकि परिणाम केवल मेरे कर्म से तय नहीं होता।

परिस्थितियाँ, दूसरे लोगों के कर्म, समय और प्रकृति—बहुत सी चीजें हमारे नियंत्रण से बाहर हैं।

हमारे हाथ में क्या है?

अपना कर्म।

और यही कर्मयोग की दिशा है।

कृष्ण कर्म क्यों करते हैं?

श्रीकृष्ण के कर्म का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है—लोकसंग्रह।

अर्थात् संसार की व्यवस्था और कल्याण को बनाए रखना तथा लोगों के सामने सही आचरण का उदाहरण रखना।

सोचिए, अगर श्रीकृष्ण कहते—

“मुझे कुछ चाहिए नहीं, इसलिए मैं कर्म नहीं करूँगा।”

तो सामान्य मनुष्य भी यही कह सकते थे कि जब भगवान को ही कर्म करने की जरूरत नहीं, तो हमें क्यों करनी चाहिए?

इसीलिए श्रीकृष्ण स्वयं कर्म करते हैं।

उनका कर्म किसी कमी से नहीं, बल्कि पूर्णता से निकलता है।

यही इस श्लोक की सबसे गहरी बातों में से एक है।

कर्म बड़ा है या स्वार्थ?

अब वापस उस सवाल पर आते हैं जिससे यह लेख शुरू हुआ था—

कर्म बड़ा है या स्वार्थ?

शायद गीता का उत्तर है—

कर्म बड़ा है, लेकिन तब जब कर्म केवल स्वार्थ का साधन न रह जाए।

स्वार्थ से किया गया कर्म हमें फल से बाँधता है।

कर्तव्य-बोध से किया गया कर्म हमें मजबूत करता है।

और लोकहित की भावना से किया गया कर्म हमें अपने छोटे से “मैं” से बाहर निकालता है।

श्रीकृष्ण का कर्म इसी बात का उदाहरण है।

उन्हें कुछ प्राप्त करना बाकी नहीं था, फिर भी उन्होंने कर्म छोड़ा नहीं।

शायद गीता का असली रहस्य यही है

जिस व्यक्ति को कुछ चाहिए, वह कर्म करता है ताकि उसे कुछ मिल सके।

लेकिन जिसे कुछ प्राप्त करना बाकी नहीं है, वह भी कर्म करता है—ताकि संसार चलता रहे, दूसरे सीख सकें और लोकहित बना रहे।

इसलिए कर्म केवल कुछ प्राप्त करने का माध्यम नहीं है।

कभी-कभी कर्म स्वयं साधना बन जाता है।

और शायद यही कर्मयोग है।

गीता पढ़ते हुए मुझे अक्सर लगता है कि श्रीकृष्ण हर बार कोई नया उत्तर नहीं दे रहे होते। शायद बदलता मैं हूँ, इसलिए वही श्लोक हर बार एक नया अर्थ खोल देता है।

आज अगर मैं पूछता हूँ—

“भगवान, मुझे क्या मिलेगा?”

तो शायद गीता मुझे धीरे से दूसरा प्रश्न पूछना सिखाती है—

“तुम्हारा कर्म क्या होना चाहिए?”

और शायद इसी प्रश्न में कर्मयोग का असली रहस्य छिपा है।

कर्म करो, लेकिन केवल अपने लिए नहीं।
फल की इच्छा हो सकती है, लेकिन फल को अपनी पहचान मत बनाओ।
और जब जीवन में कुछ पाने की आवश्यकता कम होने लगे, तब कर्म छोड़ना नहीं—बल्कि अपने कर्म को किसी बड़े उद्देश्य से जोड़ देना।

क्योंकि श्रीकृष्ण का संदेश केवल यह नहीं है कि “कर्म करते रहो।”

शायद उनका गहरा संदेश यह है—

“ऐसा कर्म करो, जिसमें तुम्हारा ‘मैं’ धीरे-धीरे छोटा होता जाए और तुम्हारा कर्म तुमसे बड़ा होता जाए।”


आपसे एक सवाल…

आपके लिए कर्म का अर्थ क्या है—अपनी इच्छाओं को पूरा करना या अपने कर्तव्य को निभाना?

क्या कभी ऐसा हुआ है कि आपने पूरी ईमानदारी से कर्म किया, लेकिन परिणाम आपकी इच्छा के अनुसार नहीं मिला? उस अनुभव ने आपको क्या सिखाया?

अपने विचार नीचे कमेंट में जरूर साझा करें।
हो सकता है आपका एक अनुभव किसी दूसरे पाठक को गीता के इस गहरे संदेश को समझने में मदद कर दे।

और अगर आपको यह लेख उपयोगी लगा हो, तो इसे अपने मित्रों और परिवार के साथ जरूर साझा करें, ताकि कर्म और निष्काम भाव पर यह संवाद आगे बढ़ सके।

क्योंकि शायद गीता को केवल पढ़ना ही पर्याप्त नहीं है—उसे अपने जीवन में उतारने की कोशिश करना ही उसकी असली शुरुआत है।

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