तनाव और डिप्रेशन से थक चुके हैं? : खुद से जंग
आपके भीतर की महाभारत: खुद से जंग और जीतने का सही तरीका
दोस्तों, आज हम उस विषय पर बात करेंगे जिससे आज का हर इंसान परेशान है। हर कोई किसी न किसी दूसरे इंसान से या अपनी परिस्थितियों से उलझा हुआ है। जब स्थितियाँ बिगड़ती हैं, तो इंसान उन्हें संभालने के लिए या तो इधर-उधर भटकता रहता है, या फिर थक-हारकर डिप्रेशन (तनाव) में चला जाता है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि असली समस्या बाहर है या हमारे अंदर?
अगर हम एक दूसरे नज़रिए से देखें, तो हर इंसान के भीतर हर वक्त एक 'महाभारत' चल रही है।
बाहर की दुनिया बनाम आपके भीतर की सेना
इस आंतरिक युद्ध में, बाहरी दुनिया और हमारा खुद का विकृत मन (जो बाहरी चीज़ों के प्रभाव में आकर भटक चुका है), विपक्ष की सेना (कौरवों) की तरह हैं। ये हमें लगातार कमज़ोर करते हैं और हम पर हावी होने की कोशिश करते हैं।
दूसरी तरफ, इस युद्ध को जीतने के लिए आपके पास अपनी खुद की एक शक्तिशाली सेना है:
- 6 इन्द्रियां (6 Senses): आपके पाँच बुनियादी सेंस और आपका छठा सेंस (Intuition या अंतर्ज्ञान)।
- शुद्ध मन: आपका हृदय, आपकी अंतरात्मा और आपकी सच्ची भावनाएं।
- प्रकृति (नाभि): आपकी नाभि, जो आपके शरीर का मुख्य ऊर्जा केंद्र (Core Energy Center) है।
- आपका संपूर्ण शरीर: आपकी भौतिक ताकत।
बाहर की किसी भी जंग या परिस्थिति को आप तभी जीत सकते हैं, जब आपका शरीर, आपकी इन्द्रियां और आपकी आंतरिक प्रकृति—आपके शुद्ध मन के साथ एकजुट (United) हो जाएं।
जीत का सूत्र: शुद्ध मन को मनाएं
इस युद्ध को जीतने के लिए आपको केवल अपने 'शुद्ध मन' पर काम करना होगा। अगर आपकी अंतरात्मा या शुद्ध मन किसी बात के लिए पूरी तरह राज़ी और आश्वस्त (Convince) हो गया, तो शरीर और इन्द्रियां अपने आप उसके सामने नतमस्तक हो जाएंगी।
इसे एक उदाहरण से समझते हैं:
मान लीजिए आपने अपनी बॉडी बनाने का एक विज़न बनाया कि सुबह जिम जाना है। अब सुबह उठते ही बाहरी परिस्थितियां (जैसे गहरी नींद, आलस या भटकता हुआ विकृत मन) आपको रोकती हैं। आपकी इन्द्रियां मना कर देती हैं और आप जिम नहीं जा पाते क्योंकि आपका अंदरूनी सिस्टम बिखरा हुआ है।
मान लीजिए आपने अपनी बॉडी बनाने का एक विज़न बनाया कि सुबह जिम जाना है। अब सुबह उठते ही बाहरी परिस्थितियां (जैसे गहरी नींद, आलस या भटकता हुआ विकृत मन) आपको रोकती हैं। आपकी इन्द्रियां मना कर देती हैं और आप जिम नहीं जा पाते क्योंकि आपका अंदरूनी सिस्टम बिखरा हुआ है।
यहाँ आपको अपनी अंदरूनी सेना को समझाना और मनाना पड़ेगा, लेकिन कोई जबरदस्ती नहीं!
'बैलेंस पॉलिसी' (संतुलन का नियम) अपनाएं
अक्सर लोग बदलाव के लिए खुद पर बहुत ज़्यादा ज़बरदस्ती करते हैं, जिससे मन और चिढ़ जाता है। आपको बिना किसी मानसिक तनाव के, पूरी जागरूकता (Awareness) के साथ अपनी सेना को एक दिशा में लाना होगा। जब आप धीरे-धीरे अपने मन को प्यार से मनाएंगे, तो बिना किसी दबाव के आपका रूटीन अपने आप बनने लगेगा।
आपके पूरे सिस्टम (शरीर, मन और आत्मा) का इस तरह एकजुट होना ही आपके जीवन की सबसे बड़ी पूजा (Worship) होनी चाहिए।
न त्याग की ज़रूरत, न ज़बरदस्ती की आदत
इस जीवन दर्शन में न तो किसी चीज़ का पूरी तरह त्याग करने की ज़रूरत है और न ही किसी आदत को ज़बरदस्ती अपनाने की। जब जैसा ठीक लगे, वैसा करें—बस शर्त यह है कि उसमें आपकी पूरी अंदरूनी सेना की रज़ामंदी होनी चाहिए।
उदाहरण के लिए:
अगर आपका मीठा खाने का मन है और आप उसे पूरी चेतना, खुशी और बिना किसी डर के स्वाद लेकर खाते हैं, तो आपका शरीर उसे सकारात्मक रूप से स्वीकार करेगा। लेकिन अगर आप मीठा खाते समय अंदर ही अंदर डर, चिंता या गिल्ट (पछतावा) से भरे हुए हैं, तो वह मानसिक तनाव आपके शरीर के मेटाबॉलिज्म को बिगाड़ देगा। तनाव के कारण शरीर में बढ़ने वाले हार्मोंस उस मीठे को बीमारी (जैसे डायबिटीज़ या अन्य समस्याएं) का रूप दे देंगे। इसलिए समस्या मीठे में नहीं, आपके अंदर के डर और असंतुलन में है।
अगर आपका मीठा खाने का मन है और आप उसे पूरी चेतना, खुशी और बिना किसी डर के स्वाद लेकर खाते हैं, तो आपका शरीर उसे सकारात्मक रूप से स्वीकार करेगा। लेकिन अगर आप मीठा खाते समय अंदर ही अंदर डर, चिंता या गिल्ट (पछतावा) से भरे हुए हैं, तो वह मानसिक तनाव आपके शरीर के मेटाबॉलिज्म को बिगाड़ देगा। तनाव के कारण शरीर में बढ़ने वाले हार्मोंस उस मीठे को बीमारी (जैसे डायबिटीज़ या अन्य समस्याएं) का रूप दे देंगे। इसलिए समस्या मीठे में नहीं, आपके अंदर के डर और असंतुलन में है।
निष्कर्ष: अपने अंदर चल रहे इस युद्ध को डर, गिल्ट या ज़बरदस्ती से नहीं, बल्कि आंतरिक एकता और संतुलन (Balance Policy) से जीतें। जब आपका पूरा सिस्टम अंदर से एक सुर में होगा, तो बाहर की कोई भी परिस्थिति आपको हिला नहीं पाएगी।
अब आपकी बारी (Call to Readers)
दोस्तों, आपके भीतर की महाभारत में इस वक्त कौन सा पक्ष भारी है—बाहरी परिस्थितियाँ या आपका शुद्ध मन? क्या आपने भी कभी महसूस किया है कि जब आप किसी काम को बिना किसी डर और पूरे दिल से करते हैं, तो उसका परिणाम कितना अलग होता है?
- अपने विचार साझा करें: नीचे कमेंट बॉक्स में मुझे ज़रूर बताएं कि इस 'बैलेंस पॉलिसी' के बारे में आपकी क्या राय है।
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