ब्रह्मांड इतना बड़ा है ?

 


मुझे कभी ध्यान ही नहीं आया कि यह ब्रह्मांड कितना बड़ा है।

जरा सोचिए…

जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं, उस पर हमारी अपनी जगह क्या है?
शायद समुद्र में तैरते किसी छोटे-से बुलबुले जितनी।

अब इसी पृथ्वी की तुलना पूरे सौरमंडल से कीजिए। हमारी स्थिति शायद फिर उसी बुलबुले जैसी ही लगेगी।

और फिर सोचिए कि एक आकाशगंगा में कितने तारे और कितने सौरमंडल हो सकते हैं। उसके बाद इस पूरे ब्रह्मांड में मौजूद असंख्य आकाशगंगाओं की कल्पना कीजिए।

तब हमारी तुलना करना ही मुश्किल हो जाता है।

इतने विशाल ब्रह्मांड में हमारा अस्तित्व कितना छोटा है!

लेकिन मजेदार बात यह है कि इसी छोटे-से अस्तित्व को अपनी समस्या पूरी दुनिया की सबसे बड़ी समस्या लगती है।

है न, थोड़ी पागलपन जैसी बात?

हमारे 250 ग्राम के दिमाग में कितना बड़ा संसार है!

जरा अपने मन के अंदर झांककर देखिए।

एक तरफ मैं हूँ और मेरे चारों तरफ फैली यह वास्तविक दुनिया।

दूसरी तरफ वह दुनिया है, जो मैंने अपने मन में बना रखी है।

फिर अतीत की यादें हैं—क्या हुआ, किसने क्या कहा, मैंने क्या किया, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था, उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया…

फिर भविष्य की चिंता है—आगे क्या होगा? नौकरी का क्या होगा? परिवार का क्या होगा? पैसा पर्याप्त होगा या नहीं? स्वास्थ्य कैसा रहेगा? लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे?

इसके बाद वह ज्ञान है, जिसे मैंने जीवनभर अलग-अलग जगहों से इकट्ठा किया है।

फिर हमारी मान्यताएँ हैं, हमारे संस्कार हैं, धर्म है, कर्तव्य हैं, रिश्ते हैं, अपेक्षाएँ हैं, इच्छाएँ हैं और उनसे जुड़ी निराशाएँ हैं।

और इन सबको संभालने के लिए हमारे पास है यह छोटा-सा दिमाग।

लगभग 250 ग्राम का यह मस्तिष्क… और इसके अंदर पूरा ब्रह्मांड!

तो फिर सिरदर्द होना लाजिमी नहीं तो और क्या होगा?

आखिर करें क्या?

यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण है।

क्या हमें सब कुछ छोड़ देना चाहिए?

क्या परिवार, काम, रिश्ते और जिम्मेदारियों से भाग जाना चाहिए?

शायद नहीं।

समस्या संसार में उतनी नहीं है, जितनी उस संसार की पकड़ में है जिसे हमने अपने मन में बना लिया है।

इसी बात की एक गहरी झलक मुझे ऋषि अष्टावक्र की शिक्षाओं में दिखाई देती है।

राजा जनक को दिए गए उनके ज्ञान का भाव कुछ ऐसा है कि जब मनुष्य के भीतर संसार का आकर्षण और उसकी पकड़ समाप्त होने लगती है, तब दूसरे के प्रति न तो वैसा मोह रहता है और न ही वैसी घृणा।

क्यों?

क्योंकि उसकी दृष्टि बदल जाती है।

वह स्वयं को हर घटना का अंतिम कर्ता मानना छोड़ देता है। वह परम सत्ता को कर्ता और स्वयं को केवल निमित्त मानने लगता है।

और जब “मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ” का भाव कमजोर होता है, तो जीवन का बोझ भी धीरे-धीरे हल्का होने लगता है।

हम अपने प्रयासों से ही क्यों थक जाते हैं?

हमारी सबसे बड़ी थकान काम करने से नहीं आती।

हमारी थकान आती है—

हर चीज को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश से।

हम चाहते हैं कि लोग हमारे अनुसार व्यवहार करें।

परिस्थितियाँ हमारी इच्छा के अनुसार चलें।

भविष्य हमारी योजना के अनुसार बने।

अतीत हमारी इच्छा के अनुसार बदला जा सके।

और जब ऐसा नहीं होता, तो मन संघर्ष करने लगता है।

यहीं से चिंता पैदा होती है।

यहीं से क्रोध आता है।

यहीं से मोह और घृणा जन्म लेते हैं।

और यहीं से वह छोटा-सा मन अपने ऊपर पूरे संसार का भार उठा लेता है।

हेलेन केलर की कहानी हमें क्या सिखाती है?

हेलेन केलर बचपन में अपनी दृष्टि और श्रवण शक्ति खो बैठीं और बाद में बोलने में भी गंभीर कठिनाई का सामना करना पड़ा।

फिर भी उन्होंने जीवन में असाधारण कार्य किए और अनेक पुस्तकें लिखीं।

उनकी कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जीवन की परिस्थितियाँ हमेशा हमारे हाथ में नहीं होतीं, लेकिन उन परिस्थितियों के प्रति हमारी दृष्टि बहुत कुछ बदल सकती है।

एक व्यक्ति अपनी सीमाओं के बावजूद जीवन को अर्थ दे सकता है।

और दूसरी ओर, हमारे पास देखने-सुनने की सारी क्षमताएँ होते हुए भी हम अपने मन की बनाई हुई समस्याओं में उलझे रह सकते हैं।

तो फिर असली बंधन कहाँ है?

शायद बाहर नहीं।

अंदर।

क्या हमें सब कुछ भूल जाना चाहिए?

यहाँ एक बहुत सूक्ष्म बात समझने की जरूरत है।

अतीत को भूलना मतलब अपनी स्मृतियों को मिटा देना नहीं है।

ज्ञान को छोड़ना मतलब अज्ञानी हो जाना नहीं है।

कर्तव्य छोड़ना मतलब जिम्मेदारियों से भागना नहीं है।

और संसार से विरक्त होना मतलब संसार से नफरत करना भी नहीं है।

असल बात शायद यह है कि हम जो देखते हैं, सुनते हैं, समझते हैं और याद रखते हैं—उनमें अपने “मैं” को इतना न उलझाएँ कि वही हमारी पूरी पहचान बन जाए।

मैंने कुछ देखा—लेकिन मैं केवल वह घटना नहीं हूँ।

मैंने कुछ सुना—लेकिन मैं केवल वह शब्द नहीं हूँ।

मेरे साथ कुछ हुआ—लेकिन मैं केवल अपना अतीत नहीं हूँ।

मेरे भविष्य की चिंता है—लेकिन मैं अपनी चिंता भी नहीं हूँ।

और शायद यहीं से भीतर एक दूरी पैदा होती है।

एक ऐसी दूरी, जहाँ विचार हैं लेकिन विचारों का गुलाम होना नहीं है।

यादें हैं, लेकिन यादों में डूब जाना नहीं है।

कर्तव्य हैं, लेकिन कर्तव्य के परिणाम का पूरा भार अपने सिर पर उठाना नहीं है।

फिर वह शांति कहाँ है?

शायद जिसे हम जीवनभर बाहर खोजते रहते हैं, वह शांति हमारे भीतर ही मौजूद है।

लेकिन मन इतना भरा हुआ है कि उसकी आवाज सुनाई नहीं देती।

हमने उसमें अतीत भर रखा है।

भविष्य भर रखा है।

दूसरों की राय भर रखी है।

अपनी उपलब्धियाँ भर रखी हैं।

अपनी असफलताएँ भर रखी हैं।

अपना ज्ञान भर रखा है।

अपनी पहचान भर रखी है।

और फिर पूछते हैं—

“मन शांत क्यों नहीं है?”

शायद शांति पाने के लिए हमेशा कुछ नया जोड़ने की जरूरत नहीं होती।

कभी-कभी कुछ पकड़ छोड़नी पड़ती है।

शायद मुक्ति का अर्थ यही है

शायद अष्टावक्र का संकेत इसी ओर है—

जब तक हम अपने देखे हुए, सुने हुए, समझे हुए और संचित किए हुए संसार को ही अपनी वास्तविक पहचान मानते रहेंगे, तब तक मन उसी संसार में घूमता रहेगा।

और जब धीरे-धीरे यह समझ आने लगे कि—

मैं अपने विचार नहीं हूँ।
मैं अपनी स्मृतियाँ नहीं हूँ।
मैं अपनी चिंताएँ नहीं हूँ।
मैं अपनी उपलब्धियाँ नहीं हूँ।
मैं केवल अपनी भूमिका भी नहीं हूँ।

तब भीतर कुछ ऐसा बचता है, जिसे शब्दों में समझाना कठिन है।

वही शांति है।

वही आनंद है।

और शायद वही वह परमात्मा है, जिसे हम बाहर खोजते-खोजते थक जाते हैं।

ब्रह्मांड कितना बड़ा है, इसका उत्तर शायद विज्ञान हमें देता रहेगा।

लेकिन उससे भी बड़ा प्रश्न यह है—

इस विशाल ब्रह्मांड के बीच अपने छोटे-से जीवन को लेकर मेरे मन में इतना बड़ा संसार आखिर बना कैसे?

और शायद उससे भी बड़ा उत्तर है—

जिस दिन भीतर का वह संसार थोड़ा शांत हो जाएगा, उसी दिन बाहर का पूरा ब्रह्मांड भी उतना डरावना नहीं लगेगा।

क्योंकि तब हमें समझ आने लगेगा—

संसार को संभालना हमारा काम नहीं है।
अपना कर्तव्य करना हमारा काम है।
और स्वयं को उस परम सत्ता के हाथों में एक निमित्त मान देना शायद शांति की शुरुआत है।

to read our previous blogs, click here

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

महाभारत की अनसुनी कथा

जीवन है या भूलभुलैया?

सबसे बड़ी समस्या?