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जनवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

महाभारत की अनसुनी कथा

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क्या आप जानते हैं ? जब 18 दिनों तक चलने वाला महाभारत-युद्ध जब समाप्त हुआ तो नियम के अनुसार पहिले सारथी उतरता है, और फिर सवार। लेकिन उस दिन श्री कृष्ण ने अर्जुन को पहले उतरने को कहा। जैसे ही कृष्ण स्वयं उतरे और हनुमान (ध्वजा पर विराजमान) अंतर्धान हुए, रथ धधककर जल उठा।  अर्जुन ने तब घबराकर श्री कृष्ण की और देखा तो श्री कृष्ण ने कहा, "हे अर्जुन! यह रथ तो भीष्म, द्रोण और विशेषकर कर्ण के दिव्यास्त्रों से बहुत पहले नष्ट हो चुका था। मेरी शक्ति और हनुमान की उपस्थिति से ही यह मेरे संकल्प पर चल रहा था।" इससे अर्जुन का अहंकार मिटा, जो कर्ण पर विजय पाने से हो गया था। आध्यात्मिक अर्थ 1. ईश्वर की कृपा ही रक्षा है      • रथ का नष्ट होना यह दर्शाता है कि मनुष्य का शरीर और साधन केवल ईश्वर की शक्ति से ही सुरक्षित रहते हैं।      • जब तक कृष्ण सारथी हैं और हनुमान ध्वज पर हैं, तब तक कोई भी दिव्यास्त्र हानि नहीं कर सकता। 2. अहंकार का त्याग      • अर्जुन को पहले उतरने को कहना यह संकेत है कि साधक को पहले अपने अहंकार और "मैं" भाव से उतरना चाहिए। ...

क्या है हमारे जीवन की सबसे बड़ी चुनौती?

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प्रस्तावना हमारे जीवन की सबसे बड़ी चुनौती कोई बाहरी शत्रु नहीं है, बल्कि भीतर का भ्रम (confusion) है। जब मन उलझा रहता है, तो निर्णय गलत हो जाते हैं, संघर्ष बढ़ जाते हैं और शांति खो जाती है। निर्णय और संघर्ष – गीता का मनोविज्ञान 1. प्रस्तावना - जीवन में सबसे बड़ी चुनौती: confusion - गीता का महत्व: केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन का विज्ञान 2. भ्रम और निर्णय - भ्रम (confusion) से मुक्त होना ही पहला कदम - स्पष्टता (clarity) के बिना हर निर्णय गलत दिशा में ले जाता है - “निर्णय छोटा हो या बड़ा, clarity ज़रूरी है” 3. लंबी लड़ाई का जाल - अनावश्यक संघर्ष और विवाद जीवन को उलझाते हैं - लंबी जंग छेड़ना = ऊर्जा और समय की बर्बादी - गीता का संदेश: संघर्ष से बचो, साक्षी भाव अपनाओ साक्षी भाव का अर्थ साक्षी भाव का मतलब है अपने विचारों और भावनाओं को देखने वाला बनना। • यह कायरता नहीं है, बल्कि साहस है। • साक्षी भाव में रहकर हम निर्णय से भागते नहीं, बल्कि उसे शुद्ध करते हैं। • परिवार, समाज और कार्यस्थल में भी साक्षी भाव हमें भावनाओं से ऊपर उठकर स्पष्टता देता है। 👉 “निर्णय से भागना कायरता है, निर...

माया के जाल से निकलकर जागृति तक का सफर

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 तुम्हें भी लगता है न, कि सब कुछ तुम्हारे हाथ में है? जीवन में हम अक्सर यही सोचते हैं—'मैं ही करूँगा, मैं ही कर्ता हूँ।' लेकिन जब चीजें उल्टी पड़ जाती हैं, तब माया का पर्दा खुलता है। अचानक झटका लगता है, अहंकार चूर-चूर हो जाता है। यही वो पल है जब जागृति की चिंगारी जलती है। चलो, एक सच्चे उदाहरण से समझते हैं कि असल में क्या करना है। रोज़ की ज़िंदगी का वो उदाहरण—छुट्टी का प्लान फेल! कल्पना करो: तुम्हारी कंपनी में साल की छुट्टियाँ पड़ी हैं। नकद नहीं मिलेगा, तो सोचा—'शनिवार को छुट्टी ले लूँ, रविवार आराम। मेरा हक़ है न!' टिकट बुक, प्लान रेडी। लेकिन रविवार सुबह बॉस का कॉल: 'आज ऑफिस आना पड़ेगा, इमरजेंसी है।' मन में क्या होता है? गुस्सा: 'क्यों मेरे साथ ऐसा?' खिन्नता: 'मेरा प्लान बर्बाद!' दुख: 'सब व्यर्थ गया।' यहाँ कर्म का भ्रम पकड़ा जाता है। तुमने छुट्टी लिया (कर्म), लेकिन रविवार का कॉल तुम्हारे कंट्रोल में नहीं था। सोचो—अगर तुम्हें पता होता कि बॉस कॉल करेगा, तो शायद प्लान ही न बनाते। यही माया है, जो हमें 'कर्ता' का भ्रम देती है। ज्ञान क्य...

From Loneliness to Ocean of Compassion

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  "नमस्कार दोस्तों, अब तक Manav Jagruti के पिछले ब्लॉग्स में हमने यह समझा कि इस संसार को बिना किसी दुvidhā, डर, चिंता और बाधा के कैसे जिया जा सकता है। हमने जाना कि हमारी ज़िन्दगी का उद्देश्य केवल खाना-पीना और संघर्ष नहीं है, बल्कि मानवता का धर्म है—अपने सही उद्देश्य की नाव में सवार होकर उस महा-सागर को पार करना जिसे लोग आध्यात्मिक ज्ञान कहते हैं। आज हम उसी यात्रा के अगले पड़ाव की ओर बढ़ेंगे—जहाँ व्यक्तिगत अनुभव सामूहिक ऊर्जा में बदलता है, और अकेलेपन की चुनौती करुणा व प्रेम के महासागर में विलीन हो जाती है। यह पड़ाव हमें दिखाता है कि जागरण केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना का उत्सव है।" 1. Inner Energy Awakens जैसे-जैसे साधक आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ता है, भीतर एक नई energy जन्म लेती है—उत्साह, गहरी शांति और सुख का अनुभव। यह अनुभव उसे और गहराई में उतरने के लिए प्रेरित करता है। 2. Attraction Towards Collective Awakening इस सुखद स्थिति को बढ़ाने के लिए व्यक्ति ध्यान शिविर, सत्संग या digital communities की ओर आकर्षित होता है। यहाँ उसे समान विचारधारा वाले लोग मिलते ...

क्या आप जानते हैं कि आपकी सबसे बड़ी परेशानी क्या है?

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  हम अक्सर सोचते हैं कि हमें जीवन में इतनी परेशानियों का सामना क्यों करना पड़ता है। क्या इसका कारण सिर्फ पैसा, शिक्षा या सुविधाओं की कमी है? लेकिन सच्चाई यह है कि कई बार पर्याप्त सुविधाओं और धन के बावजूद लोग खुश रहते हैं, और कम पढ़े-लिखे लोग भी गहरी संतुष्टि का अनुभव करते हैं। इसका मतलब है कि समस्या बाहरी चीज़ों में नहीं, बल्कि हमारे दृष्टिकोण और सोच में है। असली समस्या हम अपनी गलतियों को पहचानने के बजाय दूसरों में कमियाँ ढूँढ़ते हैं। हम कभी अपने व्यवहार और जीवनशैली का विश्लेषण नहीं करते। अच्छे-बुरे परिस्थितियों को मापने के हमारे मानदंड ही तनाव का कारण बनते हैं। यही हमारी तनावपूर्ण जीवन की मुख्य समस्या है। समाधान के नुस्खे 1. स्वयं का विश्लेषण (Self-Reflection) रोज़ाना कुछ मिनट अपने व्यवहार और आदतों पर विचार करें। खुद से पूछें: आज मैंने कहाँ गलती की? कहाँ सुधार की गुंजाइश है? 2. दृष्टिकोण बदलना परिस्थितियाँ हमेशा अच्छी या बुरी नहीं होतीं, हम उन्हें कैसे देखते हैं वही मायने रखता है। 3. तुलना छोड़ना दूसरों से तुलना करने पर हीनता या अहंकार दोनों पैदा होते हैं। अपनी यात्रा और प्रगति पर...

सुना है समर्पण सभी दुखों का अंत है…

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  यह पंक्ति हमें भीतर झाँकने पर मजबूर कर देती है। क्या सच में समर्पण ही वह राह है, जो हमें शांति और मुक्ति तक ले जाती है? सबसे पहले जानना ज़रूरी है—समर्पण की ज़रूरत ही क्यों पड़ेगी? क्यों कोई इंसान समर्पण करेगा? अमीर ऐशो-आराम में डूबा रहता है। गरीब रोज़ी-रोटी कमाने में व्यस्त। सुखी व्यक्ति कहता है, "समर्पण के लिए समय कहाँ?" लेकिन दुख और डर ही वह धागा हैं, जो इंसान को धक्के खाने के बाद समर्पण की ओर झुकाते हैं। जब जीवन की मार पड़ती है, तब अपनी सीमित शक्ति का एहसास होता है। तभी दूसरों से ज्ञान लेते हैं और धीरे-धीरे भगवान के चरणों में समर्पित हो जाते हैं। 🌱 समर्पण का रहस्य समर्पण कोई कमज़ोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है। दुख-डर हमारी परीक्षा हैं, जो याद दिलाते हैं—हम अकेले नहीं। अहंकार टूटने पर ही समर्पण जन्म लेता है। यह हमें छोटे "मैं" से निकालकर बड़े सत्य से जोड़ता है। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं—"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"। यानी सब कुछ छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। 📖 एक छोटी प्रेरक कहानी एक गरीब किसान था। एक साल भयंकर सूखे ने उसकी फसल नष...

जो चाहो मिलेगा l

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क्यों? यही चाहते हो ना आप सब... लेकिन कभी सोचा है कि exactly हमें चाहिए क्या? इच्छा को दबाया या रोका तो नहीं जा सकता। अब प्रश्न यह है—इच्छा वास्तव में वस्तु की होती है या उस अनुभव की जो वस्तु पाने के बाद महसूस होगा? मन मानता है कि जब कुछ पा लूँगा तब सुख होगा, या जब परिस्थिति सुधरेगी तब शांति मिलेगी। जबकि देखोगे तो पाओगे कि इच्छा किसी वस्तु से नहीं जुड़ी होती, बल्कि उस अधूरेपन की भावना से जुड़ी होती है जो मनुष्य अपने भीतर अनुभव करता है। परंतु जिस क्षण सुख का अनुभव होता है, वह इच्छा की पूर्ति से नहीं, बल्कि इच्छा और चिंता की अनुपस्थिति से होता है। सुख का रहस्य सुख पहले से ही मौजूद है। केवल इच्छा और चिंता हटने पर वह प्रकट होता है। तब प्रश्न उठता है—यदि कुछ चाहने को नहीं रहा, कुछ पकड़ने को नहीं रहा, तो जीवन किस दिशा में बहेगा? नदी दिशा से नहीं, ढलान से बहती है। जब अवरोध हट जाता है, तो प्रवाह स्वयं प्रकट होता है। इच्छा और चिंता जीवन की शक्ति नहीं, बल्कि अवरोध थीं।                     जब वे हटती हैं, तो:       ...

अनुभव से विचार तक: एक सरल यात्रा

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  साक्षी चेतना: जो देखती है, अनुभव करती है, लेकिन कभी नहीं बदलती नमस्कार, आनंदविवेक परिवार! पिछले ब्लॉग में हमने देखा कि जो बदलता है, वह दृश्य है। लेकिन जो देखता है और अनुभव करता है — वह साक्षी है, वही चेतना है। बचपन से अब तक सब कुछ देख रही यह चेतना खुद कभी नहीं बदली। आज हम इसी साक्षी चेतना की गहराई में उतरेंगे। क्या आप तैयार हैं? अनुभव किसे होता है? परतें खोलते हैं अनुभव का सवाल गहरा है। आइए देखें:                     शरीर? नहीं, वह तो सिर्फ माध्यम है — बदलता रहता है।                 मन? वह भावनाओं में उलझा रहता है, स्थिर नहीं।                 बुद्धि? वह तो विश्लेषण करती है, लेकिन अनुभव की जड़ नहीं। अनुभव का आधार चेतना है। अगर चेतना न हो, तो शरीर जीवित होते हुए भी मृत हो जाता है। यह साक्षी चेतना ही सब कुछ देखती और महसूस करती है। अनुभव कैसे विचार बनते हैं? यह क्रम देखिए:           ...

कभी सोचा कि सत्य है क्या?

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  आज हम शुरुआत करते हैं एक सवाल से: आपको क्या लगता है, इस संसार में सत्य क्या है? कहीं सुनी हुई बातों से नहीं, बल्कि अपने अनुभव से सोचकर बताइए। मेरे हिसाब से सत्य वही होना चाहिए जिसे बदला नहीं जा सकता। चारों ओर नज़र डालो ज़रा सोचिए — हमारे चारों ओर जितने भी दृश्य हैं, उनमें क्या है जो नहीं बदलता? • रास्ते बदलते हैं • इन्फ्रास्ट्रक्चर बदलता है • लोग और उनकी आदतें बदलती हैं • तापमान और मौसम बदलते हैं • पेड़-पौधे बदलते हैं • और मैं भी तो बचपन से अब तक बदल ही रहा हूँ तो क्या सब कुछ असत्य है? अगर सब बदल रहा है, तो असली सत्य कहाँ है? दर्पण का अनुभव आज सुबह जब मैंने दर्पण में खुद को देखा, तो यह साफ़ हुआ कि चेहरा भी बदलता रहा है — बचपन से जवानी और अब अधेर उम्र तक। फिर अचानक ख्याल आया: "क्या मैं भी झूठ हूँ? सत्य नहीं?" लेकिन जब थोड़ी देर गहराई से सोचा, तो लगा — अगर यह दर्पण ही न होता, तो भीतर से मुझे लगता कि मैं तो बचपन से बिल्कुल वैसा ही हूँ। असली बोध दृश्य बदलते गए, लेकिन देखने वाला वही रहा। यही है सत्य — जो कभी नहीं बदलता, जो हर परिवर्तन का साक्षी है। दार्शनिक दृष्टि • ...

Success का असली मतलब क्या है ?

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  शुरुआत – एक छोटा सवाल : “Success का असली मतलब क्या है—trophies और fame, या वो शांति जो अंदर महसूस होती है?” भूमिका हमारी अब तक की यात्रा में आपने देखा कि कैसे हमने खुद की पहचान से Success तक पहुँचने का मार्ग खोजा। और अगर कभी असफल हो भी जाएँ, तो वही असफलता हमें एक नई kick देती है—फिर से restart करने के लिए। तो अब सवाल उठता है: क्या आप बता सकते हैं कि इस Success का आंतरिक शांति से क्या संबंध हो सकता है? बाहरी उपलब्धियों का भ्रम हम अक्सर Success को बाहरी achievements से जोड़ते हैं—money, job, fame. लेकिन ये सब illusions हैं। थोड़ी देर के लिए excitement देते हैं, फिर खालीपन छोड़ जाते हैं। Success और आंतरिक शांति Real Success तब है जब मन शांत हो। जब तुम बिना fear के बोल सको, बिना anxiety के जी सको। • बाहरी achievements दूसरों की नज़रों में तुम्हें successful बनाती हैं। • Inner peace तुम्हें अपनी नज़रों में successful बनाती है। Example – Bollywood Story 3 Idiots में Rancho कहता है: “Success ke peeche mat bhaago, excellence ke peeche bhaago.” यह सिर्फ़ dialogue नहीं, बल्कि एक पूरा ज...

असफलता यात्रा का हिस्सा है, रुकावट नहीं

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  अब तक की यात्रा: मानव जागृति के   शुरुआती 4 भागों   में हमने जाना: भाग 1:  द्रष्टा कौन है ?      भाग 2:  द्रष्टा में स्थिर होना।        भाग 3:  निरंतर जागरण का अभ्यास।        भाग 4:  जीवन में जागृत रहना।    अब   भाग 5  में समझते हैं—गिरावट कैसे विकास का हिस्सा है।   जागरण का अनुभव होने के बाद भी इंसान हमेशा उसी अवस्था में नहीं रहता।   कभी-कभी पुरानी प्रोग्रामिंग सक्रिय हो जाती है , पुराने संस्कार पकड़ लेते हैं , और मन पुराने व्यवहार में लौट जाता है। इसे "गिरावट" कहते हैं। लेकिन याद रखें—यह   असफलता नहीं , प्रक्रिया का हिस्सा   है। 1. गिरावट क्यों होती है ? गिरावट अपरिहार्य है , लेकिन समझना जरूरी है। मुख्य कारण: पुरानी प्रोग्रामिंग अभी भी मौजूद:   जागरण से वह खत्म नहीं होती , सिर्फ कमजोर होती है। ट्रिगर आने पर सक्रिय हो जाती है। मन की आदतें मजबूत:   सालों पुरानी आदतें नई जागरूकता से लड़ती ...

निरंतर जागरण का अभ्यास

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  द्रष्टा में स्थिर रहना एक अवस्था है, लेकिन निरंतर जागरण एक अभ्यास है। स्थिरता कभी-कभी टूट सकती है, लेकिन जागरण का अभ्यास उसे फिर से वापस लाता है। निरंतर जागरण का मतलब है—दिनभर के हर अनुभव में अपने अस्तित्व को याद रखना। यह भाग आपको सिखाएगा कि कैसे जीवन की हर क्रिया में जागृत रहें। 1. जागरण कोई विशेष समय की गतिविधि नहीं है जागरण ध्यान का समय नहीं, न ही किसी शांत जगह या विशेष मुद्रा की जरूरत है। इसका अर्थ है—जो भी हो रहा है, उसे होते हुए देखना। यह हर जगह संभव है:           चलते समय           खाते समय           बात करते समय           काम करते समय           गुस्सा आते समय           डर उठते समय जागरण का अभ्यास जीवन के बीच में होता है, जीवन से अलग नहीं। इसे अपनाएं, तो आपका हर पल जागृत हो जाएगा। 2. विचार उठते ही पहचान लेना—यही निरंतरता की शुरुआत निरंतर जागरण का पहला संकेत: विचार आते ही उसे पकड़ लेना। मतलब: ...

स्थिरता से गहराई की ओर

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  नमस्कार दोस्तों! मानव जागृति की इस अद्भुत यात्रा में आपका स्वागत है। अगर आपने भाग 1 और भाग 2 पढ़े हैं, तो जानते होंगे कि जागरण कैसे शुरू होता है और स्थिरता कैसे पकड़ता है। अब भाग 3 में हम गहराई की ओर बढ़ते हैं। यह चरण ऐसा है जहाँ जागरण सिर्फ ध्यान की कुर्सी तक सीमित नहीं रहता – यह आपके जीवन की हर सांस में उतरने लगता है। आइए, इस गहराई को समझें। जीवन में उतरना: जागरण का विस्तार तीसरे चरण में जागरण अब एक अभ्यास नहीं, बल्कि आपकी जीवनशैली बन जाता है। कल्पना कीजिए – आप बाजार में सब्जी खरीद रहे हैं, और बीच में भी आपका भीतर का साक्षी जाग्रत है। यह "जीवन में उतरना" ही जागृति का असली स्वरूप है। बातचीत में जागरूकता: दोस्तों से गपशप कर रहे हैं, लेकिन अंदर से देख रहे हैं – "मैं बोल रहा हूँ, सुन रहा हूँ।" शब्द बाहर आते हैं, पर आप उनसे अलग रहते हैं। काम के दौरान निरीक्षण: ऑफिस में रिपोर्ट टाइप कर रहे हैं, तो मन कहता है, "मैं कर रहा हूँ।" थकान आती है, लेकिन आप उससे उलझते नहीं। भावनाओं से अलगाव: गुस्सा उबल रहा है? आप पहचानते हैं – "यह गुस्सा है, मैं नहीं।" क्रो...

द्रष्टा में स्थिरता

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  दोस्तों ,  मानव जागृति : ‘मैं कौन हूँ ?’ की यात्रा   इस श्रृंखला में हम अब तक देख चुके हैं कि जागरण का पहला स्पर्श तब होता है , जब भीतर यह प्रश्न जागता है –  “ मैं कौन हूँ ?”​ यहीं से बीज अंकुरित होता है , और साधक पहली बार महसूस करता है कि वह केवल शरीर , विचार या भावनाएँ नहीं है , बल्कि उनका द्रष्टा है। ​ जागरण का बीज — “मैं कौन हूँ ?” बीज के अंकुरित होने के बाद आता है दूसरा चरण —   स्थिरता। स्थिरता का अर्थ है: बार‑बार   द्रष्टा   में लौटना और वहाँ ठहरने का अभ्यास करना। 1. स्थिरता का अभ्यास श्वास को देखते रहना: हर श्वास आपको वर्तमान क्षण में वापस लाती है। ​ विचारों को आते‑जाते देखना: विचार आते हैं , जाते हैं , लेकिन आप उन्हें पकड़ते नहीं। ​ भावनाओं को पहचानना: गुस्सा , डर , बेचैनी—सबको बस देखते रहना , उनके साथ बह जाना नहीं। ​ 2. स्थिरता का अनुभव जब आप द्रष्टा में स्थिर होते हैं , तो भीतर एक अलग तरह की शांति का अनुभव होने लगता है। ​ हल्कापन: जैसे भीतर से कोई पुराना बोझ उतर गया हो। ​ दूरी: विचार और भावनाएँ अब उत...