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द्रष्टा में स्थिरता

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  दोस्तों ,  मानव जागृति : ‘मैं कौन हूँ ?’ की यात्रा   इस श्रृंखला में हम अब तक देख चुके हैं कि जागरण का पहला स्पर्श तब होता है , जब भीतर यह प्रश्न जागता है –  “ मैं कौन हूँ ?”​ यहीं से बीज अंकुरित होता है , और साधक पहली बार महसूस करता है कि वह केवल शरीर , विचार या भावनाएँ नहीं है , बल्कि उनका द्रष्टा है। ​ जागरण का बीज — “मैं कौन हूँ ?” बीज के अंकुरित होने के बाद आता है दूसरा चरण —   स्थिरता। स्थिरता का अर्थ है: बार‑बार   द्रष्टा   में लौटना और वहाँ ठहरने का अभ्यास करना। 1. स्थिरता का अभ्यास श्वास को देखते रहना: हर श्वास आपको वर्तमान क्षण में वापस लाती है। ​ विचारों को आते‑जाते देखना: विचार आते हैं , जाते हैं , लेकिन आप उन्हें पकड़ते नहीं। ​ भावनाओं को पहचानना: गुस्सा , डर , बेचैनी—सबको बस देखते रहना , उनके साथ बह जाना नहीं। ​ 2. स्थिरता का अनुभव जब आप द्रष्टा में स्थिर होते हैं , तो भीतर एक अलग तरह की शांति का अनुभव होने लगता है। ​ हल्कापन: जैसे भीतर से कोई पुराना बोझ उतर गया हो। ​ दूरी: विचार और भावनाएँ अब उत...

जागरण का बीज — “मैं कौन हूँ?”

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  हर मनुष्य के जीवन में एक क्षण ऐसा आता है जब भीतर से एक प्रश्न उठता है — “मैं कौन हूँ?” यह प्रश्न मात्र जिज्ञासा नहीं, बल्कि आत्मा की पुकार है। यह प्रश्न हमें बाहरी अंधेरों से भीतर की रोशनी की ओर ले जाता है। यह बौद्धिक नहीं, अनुभवात्मक खोज है — जिसे केवल महसूस किया जा सकता है, समझाया नहीं जा सकता। 1. पहचान की शुरुआत जागरण की यात्रा तब शुरू होती है जब हम अपने भीतर “द्रष्टा” को पहचानने लगते हैं — वह जो सब कुछ देख रहा है, पर स्वयं अप्रभावित रहता है। शरीर चल रहा है → “मैं शरीर नहीं, मैं देखने वाला हूँ।” विचार उठ रहा है → “मैं विचार नहीं, मैं देखने वाला हूँ।” भावना उठ रही है → “मैं भावना नहीं, मैं देखने वाला हूँ।” जैसे ही यह पहचान भीतर बैठने लगती है, एक नया दृष्टिकोण जन्म लेता है। तब हम सिर्फ जी नहीं रहे होते, बल्कि खुद को जीते हुए देख रहे होते हैं। 2. द्रष्टा का अनुभव जब कोई भीतर के द्रष्टा को छूता है, तो कुछ सूक्ष्म परिवर्तन घटित होते हैं — एक हल्कापन महसूस होता है, जैसे कोई बोझ उतर गया हो। विचारों और भावनाओं से एक स्वाभाविक दूरी बनने लगती है। भीतर एक कोमल शांति का स्पर्श होता है — ब...

"क्या आप खुद को नए रूप में देखना चाहेंगे?"

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  कभी-कभी जीवन हमें ऐसी गलियों में ले आता है जहाँ हम स्वयं को भूल जाते हैं। हम अपने वस्त्रों, अपनी स्थिति, अपनी असफलताओं से अपनी पहचान गढ़ लेते हैं। लेकिन क्या यही सत्य है? या केवल एक माया? कल मैंने एक चित्र बनाया—एक भिखारी, जिसके हाथ में कटोरा है, पर आँखों के सामने एक दर्पण। उस दर्पण में वह स्वयं को नहीं, एक राजा को देखता है। और तभी मुझे लगा, यह चित्र नहीं, एक संदेश है। एक ब्लॉग नहीं, एक आह्वान है। हर व्यक्ति ईश्वर की रचना है। हर एक में एक महत्व है। कोई भी व्यर्थ नहीं बना। व्यर्थ होती है केवल वह सोच जो स्वयं को कमजोर मानती है। आजकल लोग अवसाद में जा रहे हैं क्योंकि उन्होंने अपने अस्तित्व को दुनिया के पैमाने पर तौलना शुरू कर दिया है। लेकिन सत्य तो यह है कि तुम्हारा अस्तित्व किसी को प्रभावित करने के लिए नहीं, स्वयं को पहचानने के लिए है। जैसे तुम सोचते हो, वैसे ही बन जाते हो। तुम्हारी सोच एक आह्वान है। यदि तुम स्वयं को हार गया समझते हो, तो तुम वही बन जाते हो। यदि तुम स्वयं में एक राजा देखते हो, तो तुम्हारे चरित्र में राजसी शक्ति उत्पन्न होने लगती है। राजा जनक और अष्टाव...

"जागो! जीवन का सच्चा आनंद इंतज़ार कर रहा है"

  नमस्कार! 🙏 **क्या आप भी भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में थक चुके हैं?** आजकल हम सब **बाहरी दुनिया** में उलझे रहते हैं: ✨ नौकरी का दबाव ✨ परिवार की चिंता ✨ सोशल मीडिया की होड़ ✨ पैसों की दौड़ **फिर भी शांति नहीं मिलती। आनंद नहीं मिलता।** **क्यों?** क्योंकि हम **खुद को नहीं जानते**! **एक सच्चाई:** जितना प्रयास कर लें, बाहर की दुनिया बदलने से सच्चा सुख नहीं मिलेगा। **पहला कदम** - **खुद के भीतर झाँकना होगा**। **इस ब्लॉग का वचन:** हम आपको सिखाएँगे **खुद को जानने का सरल रास्ता**: **यह सिर्फ़ रिलैक्सेशन नहीं - यह जीवन का आनंद है!** जो **भागते-दौड़ते लोग** भी कर सकें। जो **घर बैठे** सीख सकें। जो **५ मिनट** में असर दिखाए। **आज से संकल्प:** **रोज़ रात को ५ मिनट** - आँखें बंद करके स्वांस पर ध्यान दें। **सिर्फ़ आज़माइए** - कल बताइए कैसा लगा! **मानव जागृति** - आपका अपना आध्यात्मिक साथी बनने का वचन देता है। **जागो! सच्चा आनंद **आपके भीतर** ही है। 🙏🌸