द्रष्टा में स्थिरता
दोस्तों , मानव जागृति : ‘मैं कौन हूँ ?’ की यात्रा इस श्रृंखला में हम अब तक देख चुके हैं कि जागरण का पहला स्पर्श तब होता है , जब भीतर यह प्रश्न जागता है – “ मैं कौन हूँ ?” यहीं से बीज अंकुरित होता है , और साधक पहली बार महसूस करता है कि वह केवल शरीर , विचार या भावनाएँ नहीं है , बल्कि उनका द्रष्टा है। जागरण का बीज — “मैं कौन हूँ ?” बीज के अंकुरित होने के बाद आता है दूसरा चरण — स्थिरता। स्थिरता का अर्थ है: बार‑बार द्रष्टा में लौटना और वहाँ ठहरने का अभ्यास करना। 1. स्थिरता का अभ्यास श्वास को देखते रहना: हर श्वास आपको वर्तमान क्षण में वापस लाती है। विचारों को आते‑जाते देखना: विचार आते हैं , जाते हैं , लेकिन आप उन्हें पकड़ते नहीं। भावनाओं को पहचानना: गुस्सा , डर , बेचैनी—सबको बस देखते रहना , उनके साथ बह जाना नहीं। 2. स्थिरता का अनुभव जब आप द्रष्टा में स्थिर होते हैं , तो भीतर एक अलग तरह की शांति का अनुभव होने लगता है। हल्कापन: जैसे भीतर से कोई पुराना बोझ उतर गया हो। दूरी: विचार और भावनाएँ अब उत...